हो सकता है कि आपको रेडियोवाणी की कई पुरानी पोस्‍टों पर प्‍लेयर नज़र ना आए । उन्‍हें दुरूस्‍त करने का काम एक तिहाई पूरा हो चुका है । रेडियोवाणी पर कुल लगभग तीन सौ पोस्‍टें हैं । आशा है हम शीघ्र ही सारी पोस्‍टों को दुरूस्‍त कर देंगे ।

Tuesday, May 1, 2012

'क्‍यूं प्‍याला छलकता है': मन्‍ना दा के जन्‍मदिन पर विशेष

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

आज हमारे प्रिय मन्‍ना दा का जन्‍मदिन है। मज़दूर दिवस के दिन सन 1919 में पैदा हुए थे वो। हमने प्रबोधचंद्र मन्‍ना डे की आवाज़ को हाइ-स्‍कूल के अन्‍वेषक दिनों में पहचाना था। ये दूरदर्शन और विविध-भारती से सराबोर दिन हुआ करते थे। दूरदर्शन ने दोपहर का प्रसारण शुरू किया था और तब ब्‍लैक-एंड-व्‍हाइट फिल्‍मों के गानों का एक कार्यक्रम दिखाया जाता था। और उसमें अकसर मन्ना दा के ऐसे गाने आते जो पहले हमने सुने नहीं होते थे।

 



कैसेट्स के उस दौर में मन्‍नादा के गाने खोज-खोजकर सुने। और धीरे-धीरे मन्‍ना दा की आवाज़ हमारी आवाज़ बन गयी। मन्‍ना दा हमारे पूज्‍य बन गये। मन्‍ना दा के बारे में हर जानकारी हमें आनंद देती। दिलचस्‍प बात ये है कि विविध-भारती में आने के बाद एक दिन जब महेंद्र मोदी जी ने कहा, मन्‍ना दा के घर चलोगे। मना करने का सवाल ही कहां उठता था। उन्‍हें किसी शो के सिलसिले में मुलाक़ात करनी थी। तब पहली बार मन्‍ना दा को देखा और हम अवाक रह गये। मुंह से शब्‍द ना फूटे। बस देखते रह गये।

  



मन्‍ना दा के ग़ैर-फिल्‍मी गीतों का एक डबल-कैसेट अलबम एच.एम.वी. ने रिलीज़ किया था। शायद नाम ‘His greatest Non-film hits”. हमारी पॉकेट-मनी इतनी तो थी कि उसे इसaf महंगे अलबम पर ख़ाली किया जा सके। आज डिजिटल युग में वो सभी गीत एम.पी.3 के रूप में उपलब्‍ध हैं। पर उन

कैसेट्स को देखकर हम 'छपाक'' से पुराने दिनों में छलांग लगा लेते हैं। अगर आप मन्‍ना दा के भक्‍त हैं तो ये अलबम नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। इस अलबम की रचनाओं की एक फेहरिस्‍त लगाकर मुझे उतना ही आनंद मिल रहा है, जितना इन गानों को अब तक अनगिनत बार सुनकर मिला है।



1. मेरी भी एक मुमताज थी
2. कुछ ऐसे भी पल होते हैं

  


3. सावन की रिमझिम में

थिरक-थिरक नाचे रे
4. ओ रंगरेजवा रंग दे ऐसी चुनरिया
5. चंद्रमा की चांदनी से भी नरम
6. चांद होगा ज़मीं की बात करो
7. शाम हो जाम हो सुबू भी हो


8. याद फिर आई
9. ये आवारा रातें
10. पल भर की पहचान आपसे

11. हैरा हूं ऐ सनम


12. दर्द उठा फिर हल्‍का हल्‍का

 


13. नथली से टूटा मोती रे


14. तुम जानो तुमको ग़ैर से

 


15. नज़ारों में हो तुम वगैरह।

 


16. पल भर की पहचान आपसे


17. रूक जा के सुबह तक ना हो

 


18. तुम्‍हारी जफाएं हमारी वफाएं


19. दो पंछी बेचैन


20. मुझे समझाने मेरे पास ना आए कोई



अफसोस कि HMV ने इस अलबम को अपने सी.डी. रूप में छोटा करके रिलीज़ किया है। यानी ये सारे गाने उसका हिस्‍सा नहीं हैं। लगे हाथों ये रहा लिंक सारेगामा से इसे हासिल करने का। इसके अलावा मन्‍ना दा की गाई बच्‍चन जी की 'मधुशाला' का कैसेट बचपन के उन दिनों में सबसे पहले स्‍कूली-दोस्‍त श्रवण ने दिया था। मन्‍ना दा की रचनाओं का संग्रह उसके बाद से लगातार बढ़ता गया है। मन्‍ना दा को एक बार मुंबई में लाइव-कंसर्ट में सुनने का अवसर मिला। सबसे ज्‍यादा खु़शी की बात ये थी कि उन्‍होंने मेरी एक फ़रमाईश भी पूरी की। मन्‍ना दा के चाहने वालों को उनकी आत्‍मकथा memories come alive ज़रूर पढ़नी चाहिए। इसका एक अंश 'यहां' पढ़ा जा सकता है। ये पुस्‍तक हिंदी में भी उपलब्‍ध है। नाम है--'यादें जी उठीं'। इसे पेंग्विन ने छापा है।


मन्‍ना दा अब बैंगलोर में हैं और कभी-कभी उनसे बात होती है। हर बार फोन करते हुए संकोच होता है। लगता है पता नहीं आराम कर रहे होंगे। बात करने का मन होगा या नहीं। पर फिर भी मन मानता नहीं। मन्‍ना दा दीर्घायु हों। यही शुभकामनाएं।

 



मन्‍ना दा के जन्‍मदिन पर फिल्‍म 'फिर  भी' का ये गीत।


song: kyon pyala chalakta hai
singer: manna dey
lyrics: Pt. narendra sharma
music: raghunath seth
Film: Phir Bhi  (1971)
Duration: 3 04



क्‍यूं प्‍याला छलकता है क्‍यूं दीपक जलता है
दोनों के मन में कहीं अनहोनी विकलता है ।।
पत्‍थर में एक फूल खिला, दिल को एक ख्‍वाब मिला
क्‍यूं टूट गये दोनों, इस का ना जवाब मिला
दिल नींद से उठ उठकर क्‍यूं आंखें मलता है ।।
हैं राख की रेखाएं लिखती हैं चिंगारी
हैं कहते मौत जिसे जीने की तैयारी
जीवन फिर भी जीवन जीने को मचलता है ।।
क्‍यूं प्‍याला छलकता है ।।

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Monday, April 9, 2012

'तेरे मंदिर का हूं दीपक' : रेडियोवाणी की पांचवीं सालगिरह पर विशेष


संगीत हमारी दुनिया का एक ज़रूरी हिस्‍सा है। और उसकी एक अंतर्धारा लगातार चलती रहती है। संगीत के प्रति इसी जुनून ने 'रेडियोवाणी' का आग़ाज़ करवाया था। आज जब रेडियोवाणी की पांचवीं सालगिरह है तो हैरत होती है कि ये सफर कितनी तेज़ी-से कट गया।

'रेडियोवाणी' के ज़रिये नए दोस्‍त, नए पाठक और सफर के नए साथी मिले हैं। एक जैसी रूचियों वाले लोगों का एक कारवां तैयार हुआ है। डिजिटल दुनिया के हमारी आत्‍मीय दुनिया में हस्‍तक्षेप और उसे बिगाड़ने के बारे में हम तमाम बुरी बातें सुनते रहे हैं। पर हमारी डिजिटल दुनिया ने हमारी आत्‍मीय और असली दुनिया को अब तक तो संवारा ही है और आगे भी संवारती रहेगी।

ये सच है कि रेडियोवाणी की पोस्‍टें पिछले कुछ वर्षों में घटी हैं। जब जनवरी 2012 आया था तो सोचा था कि सप्‍ताह में एक पोस्‍ट या मोटे तौर पर महीने में तीन-चार पोस्‍टों का औसत बनाकर फिर से रेडियोवाणी को गति दी जायेगी। पर पहली तिमाही बीतते बीतते हम उसे निभा नहीं पा रहे हैं। और इसके अनेक कारण हैं। 
पर ये वादा तो कर ही सकते हैं कि रेडियोवाणी पर हम लगातार बेहतर संगीत से आपको रू-ब-रू करवाते रहेंगे।

पांचवीं सालगिरह पर जो गीत चुना गया है--वो हमारे अंतर्मन को रोशनी से भर देता है।pankaj-at-late-601


पंकज मल्लिक का स्‍वर हमारे लिए ज़रूरी स्‍वरों में से एक है। आज के युग की सबसे बड़ी समस्‍या ये हो गयी है कि जहां नये-जवान एफ.एम.चैनलों के लिए पुराने संगीत का मतलब है राहुल देव बर्मन या बहुत हो गया तो शंकर जयकिशन के ज़माने का संगीत। वहीं दूसरी तरफ सचमुच लगभग सभी रेडियो-चैनल विन्‍टेज संगीत के प्रति बेरूख़ी अपना रहे हैं। हमारी घबड़ाहट इस बार तो लेकर है कि क्‍या आने वाले दिनों में..जब विन्‍टेज संगीत की दीवानी पीढी समय के चक्र में कहीं बिला जायेगी...तब...क्‍या विन्‍टेज म्यूजिक भी भुला दिया जायेगा। या फिर नई पीढ़ी में से कुछेक बच्‍चे उठेंगे--जो इस संगीत को गले लगायेंगे।

लगातार टेक्‍नो होती इस दुनिया में चंद आत्‍मीय-क्षण बटोरने के प्रयास रेडियोवाणी पर जारी रहेंगे। इस सफर पर अब तक साथ चले पाठकों, श्रोताओं, मित्रों, सहयोगियों और साथियों का शुक्रिया।


चलिए पंकज मलिक के स्‍वर में सुनें ये गीत

song: tere mandir ka hoon deepak
lyrics: pandit madhur
music: pankaj mallik
Recorded in 1940
duration 3 19





तेरे मंदिर का हूं दीपक, जल रहा
आग जीवन में मैं भर कर जल रहा ।
क्‍या तू मेरे दर्द से अनजान है
तेरी मेरी क्‍या नई पहचान है
जो बिना पानी बताशा डल रहा
आग जीवन में मैं भरकर जल रहा ।
इक झलक मुझ को दिखा दे सांवरे, सांवरे
मुझ को ले चल तू कदम्‍ब की छांह रे, सांवरे
ओ रे छलिया क्‍यों मुझे तू छल रहा
आग जीवन में मैं भरकर जल रहा
मैं तो किस्‍मत बांसुरी की बांचता
एक धुन से सौ तरह से नाचता
आंख से जमुना का पानी ढल रहा ।।


लता मंगेशकर ने इस गाने को अपने अलबम श्रद्धांजलि में शामिल किया था।
आईये ये संस्‍करण सुनें।




पंकज मल्लिक का रेडियो कलकत्‍ता से गहरा जुड़ाव रहा था। उनके बारे में कुछ और जानकारियों, तस्‍वीरों, documntory और बाक़ी सामग्री के लिए रेडियोवाणी के दूसरे पन्‍ने पर यहां आएं।

 



चलते-चलते इसी भी दर्ज कर लिया जाए...कि हम रेडियोवाणी की सालगिरह को भूल गये थे।  सचमुच।  कल दोपहर के बाद से लगभग धक्‍का देकर जिन्‍होंने हमें जगाया और बताया...उनका हृदय से आभार।

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Thursday, January 26, 2012

आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें: अल्‍लामा इकबाल की रचना। रब्‍बानी ब्रदर्स की आवाज़।

 

अकसर यू-ट्यूब पर ग़ोता लगाने से कुछ अनमोल गाने हाथ लग जाते हैं।
और इस बार भी यही हूआ है।

इस बार हमें मिली है अल्‍लामा इक़बाल की रचना 'एक नया शिवाला'।
इसे एक निजी कंपनी ने अपनी सीरीज़ 'म्‍यूजिक का तड़का' के लिए तैयार करवाया है। और आवाज़ें हैं रब्‍बानी ब्रदर्स की। रब्‍बानी ब्रदर्स कहने से तो वैसे भी समझ नहीं आता। पर अगर हम कहें कि इसे मुर्तज़ा, क़ादिर और रब्‍बानी मुस्‍तफा ने गाया है, तो शायद कुछ लोग इन गायकों को फौरन समझ जायेंगे। असल में ये तीनों रामपुर-सहसवान घराने के नामी गायक पद्म-भूषण उस्‍ताद गुलाम मुस्‍तफ़ा ख़ां के बेटे हैं। ज़ाहिर है कि उन्‍हीं के शिष्‍य भी हैं। यहां ये बता देना ज़रूरी लगता है कि इन भाईयों में से मुर्तज़ा और क़ादिर ने ए.आर.रहमान के निर्देशन में कई फिल्‍मों में गाया है। जिनमें 'पिया हाजी अली' (फिज़ां), 'नूर-उन-अल्‍लाह' (फिल्‍म मीनाक्षी), 'चुपके से' (फिल्‍म साथिया) और 'तेरे बिना बेस्‍वादी रतियां' (फिल्‍म गुरू) शामिल हैं। मुर्तज़ा आजकल रहमान की म्‍यूजिक अकादमी में गायकी सिखाते हैं।

ज़ाहिर है कि जब ये तीनों भाई एक प्रोजेक्‍ट के लिए जमा हुए तो इनके सामने अपने परिवार और घराने की विरासत का ख्‍याल रखने की चुनौती तो रही ही होगी।

आज के ज़माने में गैर फिल्‍मी देशभक्ति रचनाएं ज्‍यादा नहीं आ रहीं। यही हाल फिल्‍मों का भी है। साल दो साल में एकाध गाना आता है, और अकसर वो भी असरदार नहीं होता। ऐसे में रब्बानी ब्रदर्स की ये रचना अगर आपको रोक ले तो इसमें उनकी गायकी और अल्‍लामा इकबाल की लेखनी दोनों का योगदान माना जाए।


इक़बाल की ये रचना वाक़ई क्रांतिकारी और साहसी है। पढिए और सुनिए।
गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं

song: aa ek naya shivala
lyrics: allama iqbaal
singer: rabbani brothers (murtaza, qadir, rabbani)
duration: 2 mints.



सच कह दूं ऐ बिरहमन गर तू बुरा ना माने
तेरे सनमक़दों के बुत हो गए पुराने

अपनों से बैर रखना तूने बुतों से सीखा
जंग-ओ-जदल सिखाया वाइज़ को भी ख़ुदा ने

तंग आके मैंने आखिर दैर-ओ-हरम को छोड़ा
वाइज़ का वाज़ छोड़ा, छोड़े तेरे फ़साने

पत्‍थर की मूरतों में समझा तू ख़ुदा है
ख़ाक-ए-वतन का मुझको हर ज़र्रा देवता है

आ ग़ैरियत के परदे एक बार फिर उठा दे
बिछड़ों को फिर मिला दे, नक्‍श-ए-दुई मिटा दे

सूनी पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्‍ती
आ इक नया शिवाला इस देस में बना दें

दुनिया के तीरथों से ऊंचा हो अपना तीरथ
दामान-ए-आस्‍मां से इसका कलस मिला दे

हर सुबह उठ के गायें मंतर वो मीठे मीठे
सारे पुजारियों को मय पीत की पिला दे

शक्ति भी शांति भी भक्‍तों के  गीत में है
धरती के वासियों की मुक्ति पिरीत में है



मुमकिन है कि उर्दू के कई अलफ़ाज़ के मायने समझ ना आएं। इसलिए इस नज़्म का अंग्रेज़ी अनुवाद। जो मुझे इस ब्‍लॉग से मिला। जिसने भी अनुवाद किया है बढिया काम किया है।

I’ll tell you truth, oh Brahmin, if I may make so bold!
These idols in your temples—these idols have grown old,

To hate your fellow‐mortals is all they teach you, while
Our God too sets his preachers to scold and to revile;


Sickened, from both your temple and our shrines I have run,
Alike our preachers’ sermons and your fond myths I shun.


In every graven image you fancied God: I see
in each speck of my country’s poor dust, divinity.


Come, let us lift suspicion’s thick curtains once again,
Unite once more the sundered, wipe clean division’s stain.


Too long has lain deserted the heart’s warm habitation—
Come, build here in our homeland an altar’s new foundation,


And rise a spire more lofty than any of this globe,
With high pinnacle touching the hem of heaven’s robe!


And there at every sunrise let our sweet chanting move
The hearts of all who worship, pouring them wine of love:


Firm strength, calm peace, shall blend in the hymns the votary sings—
For from love comes salvation to all earth’s living things.

यहां देखिए


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Thursday, January 19, 2012

क्‍यों ज़रूरी है सहगल का स्‍वर--रेडियोवाणी परिचर्चा: एक

कल कुंदनलाल सहगल की याद का दिन था। वो दिन जब वो इस फ़ानी दुनिया images से गए। सवाल ये है कि ये दिन क्‍यों याद रहे लोगों को। सहगल की आवाज़ में ऐसा है ही क्‍या कि हम उन्‍हें सुनें, गुनें-बुनें और सराहें। पिछली कई नई पीढियां सहगल को 'बोरिंग' और 'ओल्‍ड' बताती रही हैं। संगीत के इस झमाझम दौर में सहगल कितने ज़रूरी स्‍वर हैं। वो क्‍या बात है कि सहगल मेरे दादाजी से लेकर मेरे लगभग तीन वर्षीय बेटे 'जादू' को भी भाते हैं।

ये सारे सवाल कल मैंने अपनी फ़ेसबुक-वॉल पर उठाये और अपने कुछ संगीत-रसिक मित्रों से जवाब चाहे। मैं ये जानना चाहता था कि असल में सहगल की हम सबकी जिंदगी में क्‍या कोई जगह है। और अगर है तो उसकी क्‍या वजह है।

सबसे पहले अपनी बात कर ली जाए। ये सच है कि हाई-स्‍कूल तक का एक दौर था जब हम सहगल को एक पुराना और बेहद 'नेज़ल स्‍वर 'मानकर रद्द कर देते थे। पर पता नहीं कैसे कब और क्‍या जादू हुआ कि हम सहगल के शैदाई हो गए। शायद संगीत के प्रति लगातार बढ़ते रूझान ने ये 'समझदारी' पैदा की होगी। मुझे याद है कि शायद स्‍कूल में सहपाठी रहे श्रवण हळवे ने मुझे सहगल का एक कैसेट उधार दिया था। और उसे सुनकर शायद ग्यारहवीं की साइंस की पढ़ाई के उस दौर में सिर्फ बतौर जिज्ञासा सुने गए सहगल मन पर छा गए थे। यहां ये जिक्र करना ज़रूरी है कि उन दिनों हम एक तरफ तो मेहदी हसन, गुलाम अली और पंकज उधास को सुन रहे थे तो दूसरी तरफ़ सहगल, मन्‍ना डे, मुकेश और रफ़ी तेज़ झोंके की तरह जिंदगी में दाखिल हो रहे थे। इन सबके बीच उस दौर की फिल्‍मों का बेहद घटिया संगीत भी हमारे होठों पर सज जाता था। संगीत की ये कैसी खिचड़ी थी। शायद हम अलग-अलग 'स्‍वाद' आज़मा रहे थे।

मुझे याद है कि जब सागर मध्‍यप्रदेश के पुरानी हवेली जैसे उस सरकारी-मकान में अपने कमरे में जब फिलिप्‍स के एक स्‍पीकर वाले मोनो कैसेट प्‍लेयर पर सहगल पहली बार बजे तो संगीत की तीखी-तीखी आवाज़ और सहगल का खरजदार स्‍वर अजीब-सा लगा। पर वो गाना फ़ौरन ही याद हो गया। 'ग़म दिये मुस्‍तकिल, कितना नाज़ुक है दिल ये ना जाना...हाय हाय ये जा़लिम ज़माना'। (फिल्‍म शाहजहां 1946 मजरूह/ नौशाद)....या फिर वो गाना 'जब दिल ही टूट गया हम जीके क्‍या करेंगे'। पर इन सबके बीच जो कुछ ऐसे गाने थे जो अचानक मन पर बस छप ही गए थे। 1938 में आई फिल्‍म 'प्रेसीडेन्‍ट' का गाना--'एक राजे का बेटा'.....1940 में आई फिल्‍म 'जिंदगी' का 'सो जा राजकुमारी' और इसी फिल्‍म का गाना--'मैं क्‍या जानूं क्‍या जादू है'।

पता नहीं था कि बरसों बाद हमारा बेटा भी यही गाने गुनगुनायेगा। और वो भी बस एक एक बार सुनवाने के बाद ही ये गाने उसे भा जायेंगे। आज 'जादू' जहां 'कोलावेरी' और 'धुनकी लागे' या 'साडा हक' जैसे ताजा हिट गाने पसंद करता है वहीं उसे ऊपर लिखे तीनों गाने बेहद पसंद हैं। क्‍यों। पता नहीं।
मुझे लगता है कि इस नकली और शोर भरे ज़माने में बहुत ईमानदार और असली सुरों और जज्‍बात की जरूरत पड़ती है। शायद इसीलिए सहगल हमारी ज़रूरत और पसंद हैं। आईये जानें कि बाक़ी लोगों ने क्‍या कहा।

जान-मानी समाचार-वाचिका शुभ्रा शर्मा ने कहा--
यह बात मैंने आज के परिक्रमा कार्यक्रम में भी कही थी...वही दोहराना चाहूंगी. याद है जब रेडियो सीलोन पर सुबह आठ बजे से नयी फिल्मों के गीत आते थे और उससे ठीक पहले पुरानी फिल्मों के संगीत में अंतिम गाना हमेशा सहगल साहब का बजाया जाता था.... हमारे घर में वह समय चैनल बदलकर समाचार लगाने का होता था. जैसे ही सहगल साहब का गाना शुरू होता मैं आज्ञाकारी बालक की तरह चैनल बदलने पहुँच जाती. पापा कहते - ठहरो, सहगल का गाना सुनने दो. मैं कहती - ओफ्फोह... पता नहीं आप क्यों इसे सुनते हैं. हमें तो ज़रा भी अच्छा नहीं लगता. और पापा बड़ी रहस्यमयी-सी मुस्कान के साथ कहते - लगेगा बेटा, एक दिन ये गाना बहुत बहुत अच्छा लगेगा. सो....वह दिन आ ही गया, पापा !!

सहगल के बारे में हमारे अभिन्‍न मित्र,  'रेडियोनामा' और 'श्रोता बिरादरी' की टीम के साथी और 'गीतों की महफिल' जैसे अनमोल ब्‍लॉग के संचालक और विन्‍टेज म्‍यूजिक के बेहद शौक़ीन सागर नाहर ने कहा--

कई चीजों को बस अनुभव की जा सकती है। उनकी खासियतों का वर्णन कर पाना बहुत मुश्किल है। बिल्कुल गूंगे के गुड़ की तरह।
शायद ही कोई सहगल प्रेमी बता सकेगा कि सहगल साहब उसे क्यों पसन्द है।

हमारे मित्र,‍ संगीत की महफिलों के संचालक, विज्ञापनों की दुनिया से जुड़े और बहुत ही मीठी शख्सियत संजय पटेल ने कहा--
इसलिये यूनुस भाई कि सहगल साहब हिन्दी चित्रपट गायन के दादा-गुरू हैं.दूसरी बात बिना किसी विरासत के एक विधा को सजाना-सँवारना और फिर उसे प्रतिष्ठित कर ऐसा रास्ता बना देना जिस पर चल कर पूरा एक दौर आगे बढे...किसी करिश्मे से कम नहीं.आवाज़ का ये कुन्दन अतुलनीय, आदरणीय, अविस्मरणीय है.

मुंबई में संगीत महफिलों का अभिन्‍न हिस्‍सा रहने वाले और संगीत के गहन शौकीन प्राण कटारिया ने कहा--
In terms of pure Gaayaki, there has been no one to touch him. He could sing a nursery rhyme without any musical acoompaniment and make it sound like a masterpiece. It was almost like he was speaking the words and not singing them. A musicians musician who inspired almost all the great singers who came after them and who initially tried to copy him-C.H Atma, Rafi, Mukesh, Kishore Kumar...and even Lata.
मोटे तौर पर प्राण कटारिया कहते हैं कि शुद्ध गायकी के मामले में सहगल का कोई जोड़ नहीं। वो बिना किसी संगीत के नर्सरी-गीत भी गा सकते थे। और उसे मास्‍टरपीस बना सकते थे। सी.एच.आत्‍मा, रफी, मुकेश, किशोर और यहां तक कि लता भी शुरूआती दौर में सहगल की कॉपी करती नज़र आई थीं।


प्रसिद्ध कवि और लेखक बोधिसत्‍व ने एक पंक्ति ने बहुत कुछ कह दिया--
सब सुर की मिठास और सरलता के कारण है।

बीके शर्मा ने सवाल उठाया कि जादू सहगल को सुनता है बात कुछ हज़म नहीं हुई। सहज सवाल है। पर इसके उत्‍तर में आपको खुद जादू को सहगल के गाने गुनगुनाते सुनवाया जायेगा। मूडी कलाकार हैं। रिकॉर्ड करने में मशक्‍कत करनी होगी।

पटना के आशुतोष पार्थेश्‍वर ने कहा--
कि सहगल उस आवाज़ के साथ मिलते हैं जिसमें सच्चाई बसती है, जो देर तक और दूर तक असर करती है और जो हमारे भीतर इस तरह उतरती है कि हमें अपने जज़्बातों के साथ ईमानदार होना ही पड़ता है...

रांची के मनीष कुमार प्रसिद्ध संगीत और ट्रैवल ब्‍लॉगर हैं। उन्‍होंने कहा--
यूनुस हर गायक का अपना एक समय होता है। सहगल एरा में हालत ये थे कि सभी गायक उनकी ही स्टाइल में गीत गाने लगे थे। धीरे धीरे किशोर मुकेश व रफ़ी ने अपना एक अलग अंदाज़ विकसित किया और ये सभी भारतीय संगीत प्रेमी जनमानस के दिल में बैठ गए। सच पूछिए जब सत्तर और अस्सी के दशक में हम बड़े हो रहे थे तो हमने इन कलाकारों के रहते सहगल की कभी कमी महसूस नहीं की। आज गायन की दृष्टि से तरह तरह की आवाज़ों को प्रश्रय मिल रहा है। आज का दौर हरफ़नमौला गायिकी का ना होकर विशिष्ट गायिकी का हो गया है। आप देखेंगे कि हर फिल्म में अलग अलग गीतों के लिए संगीतकार परिस्थिति के हिसाब से गायकों को चुन रहे हैं। अगर आज सहगल होते तो उनकी आवाज़ और स्टाइल के अनुरूप उन्हे जरूर गीत मिला करते।....

.पर उन्हें भी इसी धूम धड़ाके वाले संगीत के बीच ही गाना होता। वक़्त का पहिया सिर्फ आगे की ओर घूमता है पीछे की ओर नहीं। अगर आप ये कल्पना करना चाहें कि अगर आज सहगल होते तो क्या होता तो ये गीत सुनिए जिसे सहगल की याद में फिल्म डेहली बेली में Saigal Blues के नाम से Chetan Shashital ने गाया है।
www.youtube.com/watch?v=nER3GFyGRUc

इस गाने की सिर्फ लिंक दी जा रही है। आप यूट्यूब पर जाकर सुन सकते हैं। इलाहाबाद के पत्रकार और विश्‍लेषण अरविंद के. पांडे ने कहा--

प्रकृति के कई ऐसे रहस्य होते है जिन्हें समझना आसान नहीं ..सहगल साहब का जादू भी जो उनके गले से प्रकट हुआ उसको समझना इतना आसान नहीं ..सिर्फ महसूस करिए और यदि आप उच्च चेतनाअवस्था में है या चेतना के जिस भी स्तर पर है इस आवाज के जरिए अपनी चेतना को उन दिव्य भावनाओ से जोड़िये जो हमारे में सुषुप्त पड़ी हुई है. मेरी नज़रो में सहगल की आवाज़ का असर शाश्वत है और ये सबको अपील करता है क्योकि हम सब मूलत दिव्य है पर जानते नहीं और सहगल की आवाज़ सीधे उस दबी हुई दिव्यता को उभारती है और ये भला सा अनोखा परिवर्तन हमको बहुत भाता है. इसलिए आप सहगल को सुने और प्रभावित ना हो ऐसा संभव नहीं . मै तो यह भी कहता हूँ जिनके कान कमजोर हो और नज़र दुरुस्त हो तो कम से कम उनको चलचित्र में काम करते देख ले तो तब भी कुण्डलिनी जागृत हो जायेगी. इनको देखने से ही लगता है कि साहब कोई गन्धर्व पृथ्वी पे भूल से आ गया है :-)

इंदौर के दिलीप कवठेकर वैसे तो इंजीनियर हैं पर वे गायक और संगीत-ब्‍लॉगर भी हैं। अच्‍छे संगीत के कद्रदान हैं। उन्‍होंने कहा--

पिछले दिनों उन्हे सुनने का जतन किया था,तक अंदर से जाना कि वे किस पाये के गायक थे. उनकी लफ़्ज़ों की अदायगी, फ़िर उन्हे सुरों में स्मूथली गूंथना, और उनकी आवाज़ की रेंज? ऊफ़्फ़. तार सप्तक से मंद्र सप्तक तक बिना किसी तीखे मोड के वे उडन खटोले सी चाल में गाना रेंडर कर जाते थे. (जब देखत हो उस पार.... पर एकदम नीचे का सुर याद है?)
और तो और , उनकी आवाज़ का जो टिंबर की वजह से,उनके गाने में एक मुख्तसर सी खलिश , चुभन ज़रूर होती थी , जो कलेजे को चीर कर कहीं अंदर हमेशा चुभती रहती थी.
सहगल को सुनने का और कोई कारंण होगा या ना भी होगा, मगर न्हे कोई भी रिप्लेस नही कर पायेगा.

जबलपुर के संजय वर्मा ने कहा—.
एक वजह तो सीधी सीधी यही है ...दूसरी कि ४२ साल की छोटी सी आयु में , लगभग एक दशक के कार्य में सैकडा भर गीत गाकर में वो ऍसा क्या कर गये ....जो आज हम उन्हें संगीत की धरोहर के रूप में मानते है....आज की पीढी ना सिर्फ उन्हें सुने.. बल्कि उन पर शोध करे...ताकि '' जादू " के बाद की भी पीढ़ी नाज कर सके के .एल.सहगल साहब पर..

दिल्‍ली की रिसर्च स्‍कॉलर और ब्‍लॉगर आराधना चतुर्वेदी ने कहा-- 


मैं क्या जानूं क्या जादू है' और 'सो जा राजकुमारी'- मुझे ये दोनों गीत बचपन से ही बहुत प्रिय हैं. सहगल दिल को सुकून देते हैं. जिस तरह सीधे तीर गहरे घाव करते हैं, उसी तरह सहगल की सहजता दिल में गहरे उतरती जाती है. इतनी सहजता दुर्लभ है और यही उनकी विशेषता है.

और चलते चलते जादू के पसंदीदा सहगल-गीत। बज़रिये यू-टयूब।

मैं क्‍या जानूं क्‍या जादू है



सो जा राजकुमारी



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रेडियोवाणी की कुछ पुरानी पोस्टों पर गीत बज नहीं रहे हैं । इसकी वजह है उनकी 'होस्ट-साइट' का बंद हो जाना । कोशिश यही है कि जल्दी ही इन गीतों को फिर अपलोड करके आपको सुनवाया जाए । ले आउट बदलने की वजह से कुछ पुरानी पोस्‍टों की सामग्री अस्‍त-व्‍यस्‍त नज़र आ सकती है । इसे भी धीरे-धीरे सही करने का प्रयास है

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