हो सकता है कि आपको रेडियोवाणी की कई पुरानी पोस्‍टों पर प्‍लेयर नज़र ना आए । उन्‍हें दुरूस्‍त करने का काम एक तिहाई पूरा हो चुका है । रेडियोवाणी पर कुल लगभग तीन सौ पोस्‍टें हैं । आशा है हम शीघ्र ही सारी पोस्‍टों को दुरूस्‍त कर देंगे ।

Wednesday, April 9, 2014

'अम्‍मा मेरे बाबा को भेजो री' : रेडियोवाणी की सातवीं सालगिरह पर विशेष.

'रेडियोवाणी' हमारे लिए सिर्फ एक ब्‍लॉग नहीं. एक शग़ल, एक जुनून है।

और इस जुनून का सफ़र आज से सात बरस पहले शुरू हुआ था। शुक्र है कि 'डाक-साब' ने 'रेडियोवाणी' की सालगिरह याद दिलायी, वरना जीवन की आपाधापी में हम तो ये दिन भी बिसरा चुके थे।

अगर आप 'रेडियोवाणी' की शुरूआती पोस्‍टें देखें तो पायेंगे कि उस वक्‍त ये ब्‍लॉग अपने 'फ़ॉर्म' की तलाश में था। फिर धीरे-धीरे 'रेडियोवाणी' पर सुनने सुनाने का नियमित सिलसिला शुरू हुआ। और कई बरस तक 'रेडियोवाणी' हम बेहद नियमित रहे।

इधर के कुछ वर्षों में पारिवारिक और पेशेवर व्‍यस्‍तताओं, कुछ हद तक सोशल नेटवर्किंग वग़ैरह ने 'रेडियोवाणी' की नियमितता पर असर डाला है। हालांकि कोशिश यही रही कि हम फिर नियमित हो जाएं।

आज सातवीं सालगिरह के मौक़े पर हम 'रेडियोवाणी' की रवायत को निभाते हुए लाये हैं, अमीर ख़ुसरो की एक रचना। बहुत बरस पहले
मुरली मनोहर स्‍वरूप के संगीत निर्देशन में हज़रत अमीर ख़ुसरो की रचनाओं का एक अलबम आया था। ये रचना उसी का हिस्‍सा है। इसे गाया है सुधा मल्‍होत्रा, कृष्‍णा कल्‍ले, पुष्‍पा पागधरे और दिलराज कौर ने। तकरीबन चार मिनिट का ये गीत ज़ेहन पर हमेशा के लिए अंकित हो जाता है। हम इसकी गिरफ़्त से बाहर नहीं निकल पाते। आज 'रेडियोवाणी' की सातवीं सालगिरह पर हमारा मक़सद यही है कि आप इस सुरीली गिरफ्त में बने रहें।

Song: Amma mere baba ko bhejo ri
Singers: Sudha malhotra, Krishna kalle, Puspa pagdhare, Dilraj kaur
Lyrics: Hazrat Amir Khusro
Music : Murli Mnaohar Swarup.
Duration: 3 48




अम्मा मेरे बाबा को भेजो री,
कि सावन आया।
बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री,
कि सावन आया।
अम्मा मेरे भाई को भेजो री,
कि सावन आया।
बेटी तेरा भाई तो बाला री,
कि सावन आया।
अम्मा मेरे मामू को भेजो री,
कि साबन आया।
बेटी तेरा मामू तो बांका री,
कि सावन आया।

रेडियोवाणी पर गीत-संगीत का सुरीला सफ़र जारी है। मुमकिन है कि हम अब हर सप्‍ताह में कम से कम एक बार ज़रूर हाजिर हों। रेडियोवाणी पर सात साल से हमारा साथ निभा रहे हमसफ़र शुक्रिया के हक़दार है। शुक्रिया। शुक्रिया।

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Thursday, February 13, 2014

हम देखेंगे...लाजिम है कि हम भी देखेंगे--इकबाल बानो की आवाज़.

आज हमारे प्रिय शायर फ़ैज़ की याद का दिन है।
'फ़ैज' एक बीहड़ जिंदगी जीने वाले शायर। कितना बड़ा है उनकी लेखनी का कैनवस। उनकी पैदाइश को एक सौ तीन साल पूरे हुए।  इस दौरान दुनिया बहुत बदल गयी। तकनीक जिंदगी और समाज पर हावी हो गयी। सरोकार तरल होते चले गये। और फ़ैज़ की ज़रूरत और सांद्र होती चली गयी। उनके अशआर का वज़न सघन होता गया।  

रेडियोवाणी पर हमने 'फ़ैज़' को अकसर याद किया है। एक दिलचस्‍प बात आपको बतायें। शायद 'ग़ालिब' के बाद 'फ़ैज़' ऐसे शायर रहे हैं जिन्‍हें ख़ूब गाया गया है। नैयरा नूर, इकबाल बानो, उ. बरक़त अली ख़ां, हरिहरन, मेहदी हसन, टीना सानी, गुलाम अली, आशा भोसले जैसे कितने कितने फ़नकारों ने उन्‍हें अपनी आवाज़ बख्शी। और तकरीबन सबकी आवाज़ में फ़ैज़ को सुनना अच्‍छा लगता है। फ़ैज़ की याद में आज उनकी एक सबसे मशहूर नज़्म 'हम देखेंगे'। इक़बाल बानो की आवाज़ में। इसकी इबारत हमने 'कविताकोश' के
इस पन्‍ने से ली है। ललित और उनकी टीम का शुक्रिया।

Nazm: Hum Dekhenge
Shayar: Faiz Ahmed Faiz
Singer: Iqbal Bano
Duration: 11 19




हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल[1] में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां [2]
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महक़ूमों के पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम [3]
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर[4] भी
उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

शब्दार्थ

  1. सनातन पन्ना
  2. घने पहाड़
  3. पवित्रता या ईश्वर से वियोग
  4. देखने वाला
रेडियोवाणी पर फ़ैज़ की बाक़ी रचनाएं सुनने के लिए यहां क्लिक कीजिए।

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Saturday, February 8, 2014

तेरे ख़ुश्‍बू में बसे ख़त...जगजीत के जन्‍मदिन पर।

आज जगजीत सिंह का जन्‍मदिन है।
उस अज़ीम आवाज़ का जन्‍मदिन जिसकी उंगली पकड़कर हमने हाई-स्‍कूल के दिनों में ‘सुनना’ सीखा। क्‍या दीवानगी थी वो...वो तपती पागल दोपहरों और सुरमई उदास शामों और सितारों से जड़ी रातों के दिन थे। वो रेडियो के दिन थे। वो दिन थे फिलिप्‍स के बेशक़ीमती सिंगल स्‍पीकर कैसेट प्‍लेयर के।

वो इंटरनेट के नहीं पत्रिकाओं और अख़बारों के दिन थे। जगजीत के बारे में
jag एक लाइन भी कहीं लिखी मिल जाती तो मानो ख़ज़ाना मिल जाता। जेबख़र्च उन दिनों जगजीत के कैसेट्स ख़रीदने में जाता। और डायरियों में दर्ज होतीं वो ग़ज़लें--वो फिल्‍मी गाने जो जगजीत गाते रहे। फिर कठिन अलफ़ाज के मायने खोजे जाते और दोस्‍तों पर रौब झाड़ा जाता कि हम जगजीत को सुनते हैं। 

उन दिनों की एक और बात याद आयी। अचानक ख़बर आयी कि जगजीत के बेटे विवेक का एक सड़क हादसे में निधन हो गया है। और अब चित्रा जी नहीं गायेंगी। हाई-स्‍कूल के उन दिनों में हमने कहीं से पता खोजकर चित्रा जी के नाम एक चिट्ठी लिखी कि उन्‍हें गाना चाहिए। पता नहीं हमारी चिट्ठी वहां तक पहुंची और पढ़ी गयी या नहीं। पर चित्रा जी ने उससे आगे गाया नहीं। जगजीत ने गाया। पर फिर पुलों के नीचे से इतना पानी बह गया, पहाड़ों की बर्फ इतनी पिघल गयी और दुनिया इतनी बदल गयी कि हमारी जगजीत भी तरल होते चले गये। और हमने तय किया कि जगजीत की पुरानी आवाज़ को संदूक में सहेज कर रखेंगे। और पुरानी तस्‍वीरों के तरह बीच-बीच में वहां पनाह लेंगे।

कम नहीं है जगजीत का योगदान हम सब की जिंदगी में। उन्‍होंने हमारे दिनों को उजला बनाया। हमारी उन उदास शामों को और सुरमई बनाया..जिनमें हम सचमुच और ज्‍यादा उदास रहना चाहते थे। तारों जड़ी रातें तो कब की खो गयीं, पर समंदर किनारे के इस शहर में--सचमुच समंदर के किनारे हमने जगजीत को ख़ूब सुना। उन्‍हें देखा। उनसे फ़ोन पर बातें कीं। अब तक अपनी फ़ोन-बुक से हम उनका नाम-नंबर 'इरेज़' नहीं कर पाए। इसलिए कि जगजीत गये नहीं हैं...हैं...बस हम उनसे बात नहीं कर सकते।

इसलिए अपने अज़ीज़ फ़नकार 'मन-जीते-जगजीत' को सालगिरह की मुबारकबाद। और आपकी नज़र उनकी आवाज़ में ये रचना।

Nazm: Tere Khusboo Mein Base Khat
Lyrics: Rajendra Nath Rehbar
Singer: Jagjit Singh




तेरे ख़ुश्‍बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे
प्‍यार में डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे 

जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाए रखा

 


जिनको इक उम्र कलेजे से लगाए रखा
दीन जिनको, जिन्‍हें ईमान बनाए रखा
तेरे खुश्‍बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे

जिनका हर लफ्ज़ मुझे याद था पानी की तरह
याद थे मुझको जो पैग़ाम-ए-जुबानी की तरह
मुझको प्‍यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह
तेरे ख़ुश्‍बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे


तूने दुनिया की निगाहों से जो बचाकर लिखे
साल-हा-साल मेरे नाम बराबर लिखे
कभी दिन में तो कभी रात को उठकर लिखे 
तेरे ख़ुश्‍बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे 
प्‍यार में डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूं
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूं।






 

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Thursday, January 16, 2014

“सुलझा लेंगे उलझे रिश्‍तों का मांझा”

2014 हम सबकी जिंदगी में सोलह दिन पुराना भी हो गया। पर रेडियोवाणी पर अनेक कारणों से इसकी शुरूआत नहीं हो सकी थी।

ज़ाहिर है कि नये साल की शुरूआत हम नये इरादों और नये सपनों के साथ करना चाहते हैं। नयी उम्‍मीदों के साथ। इसलिए 'रेडियोवाणी' पर नये साल का आग़ाज़ 2013 के हमारे एक बेहद पसंदीदा गाने से की जा रही है। रेडियोवाणी पर इधर के दिनों में हमने गानों के सिर्फ बोलों पर भी ध्‍यान खींचना शुरू किया है। यानी रेडियोवाणी की परंपरा के मुताबिक़ गाने का ऑडियो, उसके बोल और फिर उसके पूरे ढांचे पर बातचीत से इतर सिर्फ बोलों पर फ़ोकस शुरू किया है। ये सिलसिला इस बरस भी जारी रहेगा। बल्कि ज्‍यादा बढ़ेगा।

जिस गाने का हम जिक्र कर रहे हैं वो 2013 की एक महत्‍वपूर्ण फिल्‍म 'काय पो चे' से है। swanand 'काय पोचे' का मतलब होता है 'वो काटा'। दरअसल ये फिल्‍म चेतन भगत के उपन्‍यास The 3 Mistakes of My Life पर आधारित थी। और बदलते वक्‍त के साथ युवा मित्रता की बदलती परतों के बारे में थी। गाने स्‍वानंद किरकिरे ने लिखे थे। ख़ासतौर पर ये गाना रेडियोवाणी पर हमें नए साल के आग़ाज़ के लिए बिलकुल मुफ़ीद लगा। ये बताते चलें कि इस गीत के लिए स्‍वानंद इसी हफ्ते 'स्‍क्रीन अवॉर्ड' हासिल कर चुके हैं। स्‍वानंद को बधाई।
(तस्‍वीर साभार स्‍वानंद की फेसबुक से)

उम्‍मीद है कि ये साल आपके लिए उलझे रिश्‍तों का मांझा सुलझाने का साल हो।
रूठे ख्‍वाबों को मना लेने का ख्‍वाब हो।
अम्‍बर झुकाने का साल हो।। शुभकामनाएं।


Song: Manjha
Singer: Amit Trivedi
Lyrics: Swannad Kirkire
Film: Kai Po Che.
Video Duration: Abt 2 Min. 



रूठे ख़्वाबों को मना लेंगे
कटी पतंगों को थामेंगे
है जज़्बा, सुलझा लेंगे उलझे रिश्तों का मांझा

सोयी तकदीरें जगा देंगे
कल को अम्बर भी झुका देंगे
है जज़्बा, सुलझा लेंगे उलझे रिश्तों का मांझा


बर्फीली आँखों में
पिघला सा देखेंगे हम कल का चेहरा
पथरीले सीने में उबला सा देखेंगे हम लावा गहरा
अगन लगी, लगन लगी टूटे ना टूटे ना जज़्बा ये टूटे ना
मगन लगी, लगन लगी कल होगा क्या, कह दो किसको है परवाह
रूठे ख़्वाबों को मना लेंगे..

 




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रेडियोवाणी की कुछ पुरानी पोस्टों पर गीत बज नहीं रहे हैं । इसकी वजह है उनकी 'होस्ट-साइट' का बंद हो जाना । कोशिश यही है कि जल्दी ही इन गीतों को फिर अपलोड करके आपको सुनवाया जाए । ले आउट बदलने की वजह से कुछ पुरानी पोस्‍टों की सामग्री अस्‍त-व्‍यस्‍त नज़र आ सकती है । इसे भी धीरे-धीरे सही करने का प्रयास है

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