हो सकता है कि आपको रेडियोवाणी की कई पुरानी पोस्‍टों पर प्‍लेयर नज़र ना आए । उन्‍हें दुरूस्‍त करने का काम एक तिहाई पूरा हो चुका है । रेडियोवाणी पर कुल लगभग तीन सौ पोस्‍टें हैं । आशा है हम शीघ्र ही सारी पोस्‍टों को दुरूस्‍त कर देंगे ।

Saturday, May 24, 2014

रांझा मेरा रांझा: रूपेश कुमार राम का बेमिसाल गीत।

इन दिनों की फिल्मों में भी कभी-कभी बेहद जज्बाती गीत मिल जाते हैं।
हम उन लोगों से सहमत नहीं, जो मौजूदा दौर के संगीत को सिरे से खारिज कर दें।
हमें लगता है कि लगातार बदलते इस परिदृश्‍य में भी कुछ बेहतर रचा जा रहा है। भले ही उसकी तादाद कम हो। पॉपुलर संगीत के बीच कुछ प्रतिभाएं बेहतर रचनाएं भी परोसती हैं। ये अलग बात है कि बहुधा वो चार्ट-बस्‍टर नहीं होतीं। इसलिए हमें उन्‍हें खोजकर सुनना पड़ता है।

हम जब इस दौर की चर्चित फिल्‍म क्‍वीन’ देखने गए, तो शुरूआत ही लंदन ठुमकता’ से हुई। गाना थिरकाने लायक़ था। पर फिल्‍म के दौरान जिस बेहद जज़्बाती गाने ने फ़ौरन ज़ेहन में जगह बना ली, वो था ‘रांझा’। एक तो ये आवाज़ पहले सुनी हुई नहीं लग रही थी। दूसरे गाना फिल्‍म पर थोपा गया नहीं था। वो कहानी के साथ ‘सुर’ में था। ज़ाहिर है कि फिल्‍म के बाद भी गाने की गूंज कायम रही। और इंटरनेटी खोजबीन में हमें पता लगा कि इसे गायक रूपेश कुमार राम ने गाया है। जो अपने आप को गायक नहीं कहलवाना पसंद करते। कोलकाता के रहने वाले रूपेश तकरीबन दस साल पहले मुंबई आए थे संघर्ष करने के मक़सद से। थोड़े दिन वो संगीतकार प्रीतम के सहायक रहे। फिर एडवर्टाइजिंग की दुनिया में सक्रिय हो गये। और बाद में उन्‍होंने अपने पंजाबी अलबम पर काम शुरू किया। गीत ‘रांझा’ इसी पंजाबी अलबम का हिस्‍सा था।

रूपेश चाहते थे कि ये गाना श्रेया जैसी कोई गायिका गाए। लेकिन जाने-माने निर्देशक अनुराग कश्‍यप ने जब ये गाना सुना तो फिल्‍म ‘क्‍वीन’ के निर्देशक विकास बहल को सुझाया। और विकास को रूपेश कुमार की आवाज़ की सादगी और कच्‍चापन पसंद आया। इस तरह ये गाना रूपेश की आवाज़ में ही रख लिया गया। अगर आपने अब तक ये गाना नहीं सुना और आज सुनेंगे तो आपको भी अहसास होगा कि विकास बहल का ये फैसला कितना सही था।
रूपेश खुद को कंपोज़र मानते हैं और उनके मुताबिक़ गाना संगीत तैयार करने से ज्‍यादा मुश्किल काम है। अफ़सोस की बात ये रही कि ‘क्‍वीन’ के अलबम में रूपेश को ठीक से क्रेडिट नहीं दिया गया। इसलिए बहुत लोग मानते हैं कि ये गाना भी अमित त्रिवेदी ने ही कंपोज़ किया है। गाना रघु नाथ ने लिखा है। जिनके बारे में फिलहाल हमें भी ज्‍यादा कुछ नहीं पता।

हमें यक़ीन है कि दो मिनिट उन्‍नीस सेकेन्‍ड के इस गाने को आप एक बार ही सुनकर नहीं रूकेंगे। और ये गीत आपके ज़ेहन में ठहर जाएगा। आंखें नम कर जाएगा। आपको जज़्बाती बना देगा।

Song: Ranjha
Film: Queen (2014)
Singer: Rupesh Kumar Ram
Lyrics: Raghu Nath
Music: Rupesh Kumar Ram
Duration: 2 19




किन्‍ना सोणा यार हीरे वेखदी नज़ारा
रांझा मेरे रांझा, रांझा मेरे रांझा
मज्‍झा चरदा बिचारा

रांझा मेरा रांझा।।
मैं हीर हां तेरी, मैं पीड़ हां तेरी
जे तू बद्दल काला, मैं नीर हां तेरी
कर जाणिए रांझे, हो डर जाणिए रांझे
ऊपरों तेरियां सोचां, मर जाणिए रांझे
मेरा रांझा मैं रांझे दी, रांझा है चितचोर
जे करके वो मिल जाए ता, की चाहिदा है होर
हो मेरा मेरा रांझा।।
तेरी आन हां रांझे, तेरी शान हां रांझे
दिल विच मय्यों धड़का, तेरी जान हां रांझे
की करां सुक्‍खाण लागियां, उमरां मुक्‍कण लगियां
हो मैनु मिल गया रांझा, नबजां रूक्‍कण रांझा
मेरा रांझा मैं रांझे दी, रांझा है चितचोर
हुण तां मैंनु मिल गया रांझा, की चाहिदा है होर।
मेरा मेरा रांझा, रांझा मेरा रांझा।।

हालांकि इस गाने को समझना इतना मुश्किल नहीं। पर कहीं से खोजकर इसका अंग्रेज़ी तरजुमा भी दिया जा रहा है। इसे आप रेडियोवाणी के दूसरे पन्‍ने पर यहां क्लिक करके पढ़ सकते हैं।

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Wednesday, April 9, 2014

'अम्‍मा मेरे बाबा को भेजो री' : रेडियोवाणी की सातवीं सालगिरह पर विशेष.

'रेडियोवाणी' हमारे लिए सिर्फ एक ब्‍लॉग नहीं. एक शग़ल, एक जुनून है।

और इस जुनून का सफ़र आज से सात बरस पहले शुरू हुआ था। शुक्र है कि 'डाक-साब' ने 'रेडियोवाणी' की सालगिरह याद दिलायी, वरना जीवन की आपाधापी में हम तो ये दिन भी बिसरा चुके थे।

अगर आप 'रेडियोवाणी' की शुरूआती पोस्‍टें देखें तो पायेंगे कि उस वक्‍त ये ब्‍लॉग अपने 'फ़ॉर्म' की तलाश में था। फिर धीरे-धीरे 'रेडियोवाणी' पर सुनने सुनाने का नियमित सिलसिला शुरू हुआ। और कई बरस तक 'रेडियोवाणी' हम बेहद नियमित रहे।

इधर के कुछ वर्षों में पारिवारिक और पेशेवर व्‍यस्‍तताओं, कुछ हद तक सोशल नेटवर्किंग वग़ैरह ने 'रेडियोवाणी' की नियमितता पर असर डाला है। हालांकि कोशिश यही रही कि हम फिर नियमित हो जाएं।

आज सातवीं सालगिरह के मौक़े पर हम 'रेडियोवाणी' की रवायत को निभाते हुए लाये हैं, अमीर ख़ुसरो की एक रचना। बहुत बरस पहले
मुरली मनोहर स्‍वरूप के संगीत निर्देशन में हज़रत अमीर ख़ुसरो की रचनाओं का एक अलबम आया था। ये रचना उसी का हिस्‍सा है। इसे गाया है सुधा मल्‍होत्रा, कृष्‍णा कल्‍ले, पुष्‍पा पागधरे और दिलराज कौर ने। तकरीबन चार मिनिट का ये गीत ज़ेहन पर हमेशा के लिए अंकित हो जाता है। हम इसकी गिरफ़्त से बाहर नहीं निकल पाते। आज 'रेडियोवाणी' की सातवीं सालगिरह पर हमारा मक़सद यही है कि आप इस सुरीली गिरफ्त में बने रहें।

Song: Amma mere baba ko bhejo ri
Singers: Sudha malhotra, Krishna kalle, Puspa pagdhare, Dilraj kaur
Lyrics: Hazrat Amir Khusro
Music : Murli Mnaohar Swarup.
Duration: 3 48




अम्मा मेरे बाबा को भेजो री,
कि सावन आया।
बेटी तेरा बाबा तो बूढ़ा री,
कि सावन आया।
अम्मा मेरे भाई को भेजो री,
कि सावन आया।
बेटी तेरा भाई तो बाला री,
कि सावन आया।
अम्मा मेरे मामू को भेजो री,
कि साबन आया।
बेटी तेरा मामू तो बांका री,
कि सावन आया।

रेडियोवाणी पर गीत-संगीत का सुरीला सफ़र जारी है। मुमकिन है कि हम अब हर सप्‍ताह में कम से कम एक बार ज़रूर हाजिर हों। रेडियोवाणी पर सात साल से हमारा साथ निभा रहे हमसफ़र शुक्रिया के हक़दार है। शुक्रिया। शुक्रिया।

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Thursday, February 13, 2014

हम देखेंगे...लाजिम है कि हम भी देखेंगे--इकबाल बानो की आवाज़.

आज हमारे प्रिय शायर फ़ैज़ की याद का दिन है।
'फ़ैज' एक बीहड़ जिंदगी जीने वाले शायर। कितना बड़ा है उनकी लेखनी का कैनवस। उनकी पैदाइश को एक सौ तीन साल पूरे हुए।  इस दौरान दुनिया बहुत बदल गयी। तकनीक जिंदगी और समाज पर हावी हो गयी। सरोकार तरल होते चले गये। और फ़ैज़ की ज़रूरत और सांद्र होती चली गयी। उनके अशआर का वज़न सघन होता गया।  

रेडियोवाणी पर हमने 'फ़ैज़' को अकसर याद किया है। एक दिलचस्‍प बात आपको बतायें। शायद 'ग़ालिब' के बाद 'फ़ैज़' ऐसे शायर रहे हैं जिन्‍हें ख़ूब गाया गया है। नैयरा नूर, इकबाल बानो, उ. बरक़त अली ख़ां, हरिहरन, मेहदी हसन, टीना सानी, गुलाम अली, आशा भोसले जैसे कितने कितने फ़नकारों ने उन्‍हें अपनी आवाज़ बख्शी। और तकरीबन सबकी आवाज़ में फ़ैज़ को सुनना अच्‍छा लगता है। फ़ैज़ की याद में आज उनकी एक सबसे मशहूर नज़्म 'हम देखेंगे'। इक़बाल बानो की आवाज़ में। इसकी इबारत हमने 'कविताकोश' के
इस पन्‍ने से ली है। ललित और उनकी टीम का शुक्रिया।

Nazm: Hum Dekhenge
Shayar: Faiz Ahmed Faiz
Singer: Iqbal Bano
Duration: 11 19




हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वो दिन कि जिसका वादा है
जो लोह-ए-अज़ल[1] में लिखा है
जब ज़ुल्म-ओ-सितम के कोह-ए-गरां [2]
रुई की तरह उड़ जाएँगे
हम महक़ूमों के पाँव तले
ये धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहल-ए-हक़म के सर ऊपर
जब बिजली कड़-कड़ कड़केगी
जब अर्ज-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाए जाएँगे
हम अहल-ए-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम [3]
मसनद पे बिठाए जाएँगे
सब ताज उछाले जाएँगे
सब तख़्त गिराए जाएँगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर[4] भी
उट्ठेगा अन-अल-हक़ का नारा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो
और राज़ करेगी खुल्क-ए-ख़ुदा
जो मैं भी हूँ और तुम भी हो

शब्दार्थ

  1. सनातन पन्ना
  2. घने पहाड़
  3. पवित्रता या ईश्वर से वियोग
  4. देखने वाला
रेडियोवाणी पर फ़ैज़ की बाक़ी रचनाएं सुनने के लिए यहां क्लिक कीजिए।

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Saturday, February 8, 2014

तेरे ख़ुश्‍बू में बसे ख़त...जगजीत के जन्‍मदिन पर।

आज जगजीत सिंह का जन्‍मदिन है।
उस अज़ीम आवाज़ का जन्‍मदिन जिसकी उंगली पकड़कर हमने हाई-स्‍कूल के दिनों में ‘सुनना’ सीखा। क्‍या दीवानगी थी वो...वो तपती पागल दोपहरों और सुरमई उदास शामों और सितारों से जड़ी रातों के दिन थे। वो रेडियो के दिन थे। वो दिन थे फिलिप्‍स के बेशक़ीमती सिंगल स्‍पीकर कैसेट प्‍लेयर के।

वो इंटरनेट के नहीं पत्रिकाओं और अख़बारों के दिन थे। जगजीत के बारे में
jag एक लाइन भी कहीं लिखी मिल जाती तो मानो ख़ज़ाना मिल जाता। जेबख़र्च उन दिनों जगजीत के कैसेट्स ख़रीदने में जाता। और डायरियों में दर्ज होतीं वो ग़ज़लें--वो फिल्‍मी गाने जो जगजीत गाते रहे। फिर कठिन अलफ़ाज के मायने खोजे जाते और दोस्‍तों पर रौब झाड़ा जाता कि हम जगजीत को सुनते हैं। 

उन दिनों की एक और बात याद आयी। अचानक ख़बर आयी कि जगजीत के बेटे विवेक का एक सड़क हादसे में निधन हो गया है। और अब चित्रा जी नहीं गायेंगी। हाई-स्‍कूल के उन दिनों में हमने कहीं से पता खोजकर चित्रा जी के नाम एक चिट्ठी लिखी कि उन्‍हें गाना चाहिए। पता नहीं हमारी चिट्ठी वहां तक पहुंची और पढ़ी गयी या नहीं। पर चित्रा जी ने उससे आगे गाया नहीं। जगजीत ने गाया। पर फिर पुलों के नीचे से इतना पानी बह गया, पहाड़ों की बर्फ इतनी पिघल गयी और दुनिया इतनी बदल गयी कि हमारी जगजीत भी तरल होते चले गये। और हमने तय किया कि जगजीत की पुरानी आवाज़ को संदूक में सहेज कर रखेंगे। और पुरानी तस्‍वीरों के तरह बीच-बीच में वहां पनाह लेंगे।

कम नहीं है जगजीत का योगदान हम सब की जिंदगी में। उन्‍होंने हमारे दिनों को उजला बनाया। हमारी उन उदास शामों को और सुरमई बनाया..जिनमें हम सचमुच और ज्‍यादा उदास रहना चाहते थे। तारों जड़ी रातें तो कब की खो गयीं, पर समंदर किनारे के इस शहर में--सचमुच समंदर के किनारे हमने जगजीत को ख़ूब सुना। उन्‍हें देखा। उनसे फ़ोन पर बातें कीं। अब तक अपनी फ़ोन-बुक से हम उनका नाम-नंबर 'इरेज़' नहीं कर पाए। इसलिए कि जगजीत गये नहीं हैं...हैं...बस हम उनसे बात नहीं कर सकते।

इसलिए अपने अज़ीज़ फ़नकार 'मन-जीते-जगजीत' को सालगिरह की मुबारकबाद। और आपकी नज़र उनकी आवाज़ में ये रचना।

Nazm: Tere Khusboo Mein Base Khat
Lyrics: Rajendra Nath Rehbar
Singer: Jagjit Singh




तेरे ख़ुश्‍बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे
प्‍यार में डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे हाथों के लिखे ख़त मैं जलाता कैसे 

जिनको दुनिया की निगाहों से छुपाए रखा

 


जिनको इक उम्र कलेजे से लगाए रखा
दीन जिनको, जिन्‍हें ईमान बनाए रखा
तेरे खुश्‍बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे

जिनका हर लफ्ज़ मुझे याद था पानी की तरह
याद थे मुझको जो पैग़ाम-ए-जुबानी की तरह
मुझको प्‍यारे थे जो अनमोल निशानी की तरह
तेरे ख़ुश्‍बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे


तूने दुनिया की निगाहों से जो बचाकर लिखे
साल-हा-साल मेरे नाम बराबर लिखे
कभी दिन में तो कभी रात को उठकर लिखे 
तेरे ख़ुश्‍बू में बसे ख़त मैं जलाता कैसे 
प्‍यार में डूबे हुए ख़त मैं जलाता कैसे
तेरे ख़त आज मैं गंगा में बहा आया हूं
आग बहते हुए पानी में लगा आया हूं।






 

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रेडियोवाणी की कुछ पुरानी पोस्टों पर गीत बज नहीं रहे हैं । इसकी वजह है उनकी 'होस्ट-साइट' का बंद हो जाना । कोशिश यही है कि जल्दी ही इन गीतों को फिर अपलोड करके आपको सुनवाया जाए । ले आउट बदलने की वजह से कुछ पुरानी पोस्‍टों की सामग्री अस्‍त-व्‍यस्‍त नज़र आ सकती है । इसे भी धीरे-धीरे सही करने का प्रयास है

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